24 Jun 2012

No. 64 नदी और साबुन


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'नदी और साबुन' पर आस्वादन टिप्पणी
        नदी और साबुन समकालीन हिंदी कविता के प्रमुख
हस्ताक्षर ज्ञानेन्द्रपति की एक प्रसिद्ध कविता है। इस कविता
के द्वारा कवि सामाजिक समस्याओं के प्रति अपनी सतर्कता
और प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं।

7 Jun 2012

No. 60 गौरा की मुख्य घटनाओं के आधार पर लक्षमणन जी की ओर से एक विडियो प्रस्तुति

video

No. 59 डायरी महादेवी की पी.डी.एफ.

No. 58 महादेवी जी की डायरी: गौरा की मृत्यु के दिन की


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कुछ महीनों तक बीमारी से पीड़ित रहकर अंत में एकदिन
ब्रह्म मुहूर्त में गौरा की मृत्यु हुई। यह घटना पशु-पक्षियों
को बहुत चाहनेवाली लेखिका महादेवी जी को बहुत
दुखदाई रही। गौरा की मृत्यु के दिन की महादेवी जी की
डायरी तैयार करें।
महादेवी जी डायरी

आज भी मैं गौरा के पास बार-बार जाती रही।
ब्रह्म मुहूर्त में चार बजे गौरा की मृत्यु हुई! उसके पास
पहुँचते ही उसने अपना मुख सदा के समान मेरे
कंधों पर रखा, और वह एकदम पत्थर जैसा भारी
होकर मेरी बाँह पर से सरककर धरती पर आ गिरा।
उसकी मृत्यु भी मेरी आँखों के सामने हुई। मैंने
कितने पशु-पक्षियों को पाला है। लेकिन उनमें सबसे
बड़ी यही थी। वह भी मनुष्य के निर्मम व्यवहार की
शिकार बनकर! हे भगवान! यह व्यथा मेरे मन से कैसे
दूर हो जाएगी। मैंने गौरा के पार्थिव अवशेष को भी
गंगा माँ को समर्पित किया। आज का दिन शोकमय रहा।

No. 57 बहन श्यामा के नाम महादेवी का पत्र पी.डी.एफ.

No. 56 बहन श्यामा के नाम महादेवी वर्मा का पत्र


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महादेवी जी अपनी बहन श्यामा के घर से एक बछिया
लाईं। वह महादेवी जी के अन्य पशु-पक्षियों से हिल-
मिलकर रहने लगी। मान लें, इस संदर्भ में लेखिका अपनी
बहन श्यामा के नाम एक पत्र लिखना चाहती हैं। लिखिका
का वह संभावित पत्र तैयार कीजिए।

अपनी बहन श्यामा के नाम
लेखिका महादेवी जी का पत्र

                                              '................',
                                                    फरूखाबाद-,
                                               ८८-८८-८८८८.
प्यारी बहन,
तुम कैसी हो घर में सब कैसे हैं। मैं यहाँ ठीक हूँ।
तुम्हारे घर से मैं जो बछिया लाई थी, वह भी बिलकुल
अच्छी है। हमने उसका नामकरण किया- गौरांगिनी। लेकिन
हम उसे गौरा पुकारते हैं। वह आजकल बहुत खुशी के साथ
रहने लगी है। हमारे अन्य पशु-पक्षियों के साथ वह हिल-
मिलकर रहने लगी है। हमारे कुत्ते-बिल्लियों ने उसके पेट के
नीचे और पैरों के बीच में खेलना शुरू किया है। जब तुमने
एक गाय पालने का उपदेश दिया था तब मैं संदेह कर रही
थी। लेकिन उसे देखते ही गाय पालने के संबंध में मेरी जो
दुविधा थी वह निश्चय में बदल गया था। क्योंकि उसका
पुष्ट सुंदर रूप मुझे बहुत आकर्षित किया था। यहाँ आकर
वह ज्यादा सुंदर बनी है।
   घर में सबको मेरा हैलो बोलना। शेष बातें अगले पत्र में।
                                               तुम्हारी बहन,  
                                                 महादेवी
सेवा में
श्यामा......,
.......................,
........................

6 Jun 2012

No. 55 दूधो नहाओ पी.डी.एफ.

No. 54 "दूधो नहाओ" पर विचार


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दूधो नहाओ पर व्याख्या

प्यारे हिंदी अध्यापक बंधुओ,
        क्या आप ने इस संदर्भ पर ध्यान दिया है?
"गौरा प्रात: सायं बारह सेर के लगभग दूध देती थी,
अत: लालमणि के लिए कई सेर छोड़ देने पर भी
इतना अधिक शेष रहता था कि आसपास के
बालगोपाल से लेकर कुत्ते-बिल्ली तक सब पर मानो
'दूधो नहाओ' का आशीर्वाद फलित होने लगा।"
(गौरा पृ.सं. 13)
'दूधो नहाओ' 'दूधों नहाओ, पूतों पलो'
आशिर्वाद का संक्षिप्त रूप है। इसका मतलब है कि
may you flourish with wealth and progency.
(मीनाक्षी हिंदी अंग्रेज़ी कोश, संस्करण 1998, पृ. 362)
हिंदी में बताएँ तो 'धन और संतान की वृद्धि हो'
(नालन्दा विशाल शब्द सागर, संस्करण 1991, पृ. 606)
यहाँ लेखिका ने गौरा के द्वारा अत्यधिक दूध
दिए जाने पर ऐसा प्रयोग किया है। लेकिन बहुत-से
मित्रों ने इसकी व्याख्या गलत दी है।
आपसे प्रार्थना है कि ऐसे विशेष बातों पर आप
अपनी संदर्भसहित व्याख्या से सहायता करें ताकि
सभी अध्यापक बंधु उससे लाभान्वित हो।
                                                आपका,  
                                                रवि. एम.



No. 53 लक्ष्मणन जी के नाम कवि ज्ञानेन्द्रपति का पत्र


नदी-पेड़: वार्तालाप पी.डि.एफ.

वार्तालाप: नदी और पेड़


मान लें कि मानव के अनियंत्रित हस्तक्षेप से प्रदूषित
और नाशोन्मुख नदी किनारे के एक पेड़ से अपनी व्यथा
सुनाती है। वह संभावित वार्तालाप तैयार करें।
नदी-पेड़: वार्तालाप
पेड़: इतनी दुखी क्यों हैं?
नदी: क्या बताऊँ, मेरी हालत देखिए न कितनी
        शोचनीय है।
पेड़: क्या-क्या कठिनाइयाँ हो रही हैं?
नदी: मेरा जल देखो, इसे इतना प्रदूषित बना दिया
        है कि उपयोग करना असंभव बन गया है।
पेड़: ऐसा क्यों हो रहा है इसके पीछे किसके हाथ हैं?
नदी: मैं सभी पशु-पक्षियों, मानव, पेड़-पौधे आदि
        सबकी सेवा करना चाहती हूँ। लेकिन मुझे तो
       बदले में पीड़ा ही मिलती है।
पेड़: आपको सबसे ज़्यादा पीड़ा और तायनाएँ
       किसकी ओर से हो रही हैं?
नदी: इस जगत में सबसे बुद्धिमान तो मानव माने जाते
        हैं। लेकिन वही मानव मेरी इस हालत का
        मुख्य कारण है।
पेड़: मानव कैसे आपको प्रदूषित और अनुपयोगी
       बना देता है?
नदी: मानव अपनी सुख-सुविधाएँ बढ़ाने के लिए जो
        नए-नए आविष्कार करते हैं वे सब मेरे लिए
       अत्यंत दोषकारी बन जाते हैं। प्लास्टिक जैसे
       सारे कूड़े-कचड़े मेरे ऊपर फेंक दिए जाते हैं।
पेड़: ये सारे कारखाने आदि अपके किनारों पर ही
      स्थित हैं न?
नदी: ज़रूर। वहाँ से निकलते मालिन्य, विषैले जल
        आदि अत्यंत मारक हैं। उसके बारे में सोचते ही
        मुझे डर होता है।
पेड़: आपका जल के उपयोग से मानव खेती करता है।
       बदले में उसका व्यवहार कैसा है?
नदी: वह भी निर्दय है। जनसंख्या वृद्धि के साथ ज़्यादा
        अनाज पैदा करना आवश्यक बन गया। तब
        अंधाधुंध कीटनाशी दवाइयों का प्रयोग शुरू
        किया गया है। वह भी मेरे जल से ही मिल
        जाती हैं।
पेड़: अच्छा ये सब कैसे बदलेगा?
नदी: हमारे चिंता और विचार से मात्र इसका समाधान
        नहीं होगा। मानव ही इसका समाधान कर सकता है।
पेड़: हम प्रार्थना करें कि इस मानव को ऊपरवाला
       अच्छी बुद्धि दें।